लॉक डाऊन में गरीब कामगार भुखमरी की कागार पर ही नही है। बल्कि इस महामारी का सबसे ज्यादा मार भी इसी पर पड़ी है।चाहे वो ग्रामीण परिवेश का मजदूर हो या शहरी परिवेश का कामगार हो।सरकार का ध्यान इनकी समस्याओं पर तो हैं उसकी जानकारी में भी है लेकिन योजनाओं का कुछ पता नही सिर्फ कागजी खेल ही है ।धरातल पर सिर्फ हवाबाजी है।.......मेडिकल जाँच और उपचार में सबसे बड़ा उपेक्षित वर्ग अगर कोई है तो ये है।इनके पास अब बचा क्या है।न रोजगार रहा न ही खाने के लिए रसद ऐसे में जीने के इन्हें कुछ भी करना पड़ेगा ।जिसमे इनके अधिकारों या हितों का ध्यान नही दिया जाएगा ।ऐसे में पुनः इन्हें गुलाम बनाने की तरफ़ ले जाया जा रहा है।सरकार ने जो कदम उठाया हैं वो भारत जैसे देश के लिए बहुत ही सोचनीय है।यह वर्ग विभेद को और मजबूती देगी।संगठित क्षेत्र और असंगठित क्षेत्र के कामगारों के बीच जो खाई आजादी के समय से चली आ रही थी ।अब और भी गहरी हो जाएगी।अतः इस दुर्दशा का शिकार जो लोग होंगे। उन लोगों को स्थापित करने का एक बडी चुनौती होगी सरकार के पास.....और सरकार इसके प्रति किसी भी प्रकार से सम्वेदनशील हैं ये दिखाई नही दे रहा है।लगभग 60% कामगारो को इस चुनौती में डूबना तय है।
आप अंदाजा लगा सकते है। सरकार की सोच क्या है।विदेशी
निवेशकों को भारत लाना और विनिवेश को और मजबूती प्रदान करना है जो सरकार की अपनी नीति रही है इस महामारी ने इसको कारण दे दिया है अब।
आज जिस तरह सेंसेक्स में भारी गिरावट आई है उसका प्रभाव भरतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा ये स्वभाविक है।
