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गुरुवार, 8 जुलाई 2021

अपेक्षा और उपेक्षा

अपेक्षा और उपेक्षा दो शब्द है,जब आप किसी से अपेक्षा रखते है और वह हो नही पता या किया नही जाता है तो आप उपेक्षा के शिकार होते हैं।उपेक्षित होने से बेहतर हैं अपेक्षा का त्याग कर देना।मानव मूल्यों को बचाये रखने के लिए अपनी सोच और समझ को बढ़ानी पड़ती हैं।
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बुधवार, 7 जुलाई 2021

कुछ तो खोया है हमनें

सोचता हूँ  कास!इस उमस भरी गर्मी में गाँव का वो तलाब होता और उसके किनारे पर लगे वो पेड़ होते जिसके किनारे पर पेड़ के नीचे बैठकर पूरा दिन गुजार दिया जाता करते थे । बचपन के दिन हम लोग ऐसे गुजार दिया  करते थे ।लेकिन दुःख इस बात का हैं अब तो वो तालाब भी पटने के कागार पर है और वो पेड़ और बगीचे भी कट गए है ,वो कुस की झोपड़ी भी नही रही ,अब तो गाँव भी शहर की तरह  पत्थरों /ईटो से बने घरो ने गाँव का पूरा जीवन ही बदल दिया है। गाँव में भी ये उमस भरी गर्मी पीछा नही छोड़ती है अब तो.......गाँव ने खूब विकास किया है.......पर गाँव में अब वो बात नहीं।......खैर क्या करूँ इस उमस भरी गर्मी का ...........एअर कन्डीशन में रहने का आदी नही होना चाहता। फिर करू क्या जिम्मेदार किसको मानु खुद को या इस मानव समाज को या उसके द्वरा किये गये इस विकास को ........हम आगे तो गये है काफी हद तक चाँद तक झण्डा गाड़ा है हमने पर .....उस आनन्द को भी खोया है हमने जो कभी आसानी से मिल जाया करती थी।इस तरह से बहुत कुछ खोया हमने अपने जीवन मे।।।।।।
#डॉ अनिल

शुक्रवार, 15 मई 2020

कोरोना संकट में लोगों की समस्याएं

 कोरोना महामारी आज के दौर में इतनी गंभीर स्थिति में है कि भारत जैसे विकासशील देश में खास करके मजदूर किसान मजदूर जो खेती मजदूरी करके अपना जीवन यापन कर रहे हैं। उनके लिए बहुत ही खतरनाक साबित सिद्ध हुआ है। हम तमाम जगहों से आ रही तस्वीरों से यह देख पा रहे हैं कि लोग हजारों किलोमीटर पैदल भूखे प्यासे नंगे पैर अपने बच्चों को कंधे पर लादे हुए दूर -दूर तक यात्राएं कर रहे हैं। यह भी देखने को मिल रहा हैकि ये लोग सिर्फ अपनी जान बचाने के लिए इतनी दूर से अपने घरों को चाल रहे हैं जबकि उनके पास ना ही पैसा है ना ही खाने के समान हैं ।उनका जीवन वाकई में कष्टदायक बन गया हैं।उनका रोजगार छीन गया है उनके जीवन यापन के लिए उनके पास कुछ भी नही बचा है। एक मानव होने के नाते हम सब लोग इस चीज को देख भी रहे और समझ भी पा रहे हैं। हममें से बहुत सारे लोग उनके प्रति अपनी संवेदना भी रख रहे हैं। उनकी मदद भी कर रहे हैं ।क्योंकि मानव जीवन के अस्तित्व में को बचाए रखने के लिए यह जरूरी है कि हम एक दूसरे की मदद करें और ऐसे समय में जब मानव के अस्तित्व के लिए ही कोरोना संकट बना हुआ हैं।जब कोई चीज खतरा बन जाए तो उस समय यह जरूरी है कि हम सब लोग उनकी मदद करें ।सरकारों से भी निवेदन होना चाहिए कि सरकार ऐसे लोगों को प्रति अपना विशेष ध्यान दें और इनको सुविधाएं प्रदान करें। अब अनुमान लगा लगाइए कि जो व्यक्ति अपने परिवार में अकेला कमाता है और उसके पीछे 5-10 लोग खाने वाले होते हैं.। तो ऐसे में क्या होगा उस परिवार का जब वह कमाने वाला व्यक्ति के पास कोई रोजगार ही नहीं है ।उस परिवार का खर्च कैसे चलेगा ।सरकार आर्थिक मदद की बात कर रही है।पर आर्थिक मदद किस तरह की होगी किन लोगों के लिए होगी किस तरह दी जाएगी ।यह तय नही कर पा रही है।सरकार ने इनको ₹2000 देने की बात कर रही है लेकिन वह ₹2000 उनको देगी किस तरीके से  यह बड़ा सोचनी विषय है। भारत में ग्रामीण अंचलों में एक सबसे बड़ी समस्या यह है या कहें कि ग्रामीण ही नहीं बल्कि शहरी क्षेत्रों के मजदूरों के लिए भी एक समस्या है । बड़ी संख्या में इन मजदूरों के पास न तो कोई भी राशन कार्ड या कोई ऐसा डॉक्यूमेंट है जिससे कि उनको खाने के लिए सामग्री दी जा सके।क्योंकि सरकार सिर्फ कार्ड धारी लोगों को ही राशन दे रही है। ऐसी में सरकारों को सोचने की जरूरत है । क्योंकि गरीब मरेगा तो जाहिर सी बात है कि उसका प्रभाव समाज के अमीर वर्ग के ऊपर भी पड़ेगा। क्योंकि इस संसार की जो एक श्रृंखला है सब से मिलकर बना हुआ समाज है और इस समाज में ऊंच-नीच सब को स्थान दिया गया है ।एक दूसरे पर आश्रित हैं ऐसे समय में जब यह मुसीबत आई है तो हमें ध्यान रखना चाहिए ऐसे समय में हम एक दूसरे के लिए हाथ बढ़ाएं और उनको मुसीबतों से निकाले एक समय कम भोजन करें लेकिन हम यह देख ले कि हमारे बगल में कोई ऐसा व्यक्ति ना हो जो भूखा सो रहा है । मैं इन तस्वीरों को देख कर के बहुत ही व्याकुल हुआ हूं और मेरा दिल बहुत  रो रहा है समस्याएं हो रही हैं लोगों की तकलीफें देख कर के दिल मचल जा रहा है भगवान यह दुनिया किस तरफ चलेगी ।लोगो की समस्या कैसे जाएगी इसकी कल्पना कर पाना संभव नहीं है आज के दौर में अब यह पता चल गया है कि हम चाहे जितने भी ज्ञान से आगे चले जाएं लेकिन प्रकृति के आगे हम नहीं जा सकते प्रकृति को समझना हमारे लिए एक बड़ा चैलेंज है। आपने देखा होगा न्यूज़ चैनलों के माध्यम से की जो यमुना नदी दिल्ली में इतनी गदगी से भरी थी।यहाँ तक कि यमुना अब अपनी गंदगी के लिए उसे  अब जानी जा रही थी ।लाख योजना लागू होने के बाद भी उसकी कोई  सफ़ाई नही हो पा रही थी और हमने देखा कि लाक डाउन लगने की वजह से इस संकट के आने से कल कारखानों के बंद हो जाने से पर्यावरण साफ हुआ और नदियां झील ऐसी तमाम जगह साफ होो गए है।जो पर्यावरण की दृष्टि से फायदेमंद हुआ है ।यह कहा जा सकता है कि मानव  ही कहीं ना कहीं पर्यावरण  के लिए खतरा बना है। तो हम मानव होने के नाते प्रकृति में संतुलन बनाए रखने के लिए अपने जीवन को बचाए रखने के लिए अस्तित्व को बचाए रखने के लिए हम सबको प्रकृति को बचाना  होगा ।अब यह सब को समझ लेना चाहिए अगर प्रकृति की रक्षा नहीं की गई तो कुछ भी हो सकता है हम यह कह सकते हैं की प्रकृति जब तक सही रहेगी तो हमें हमारे स्वास्थ्य पर भी अच्छा प्रभाव पड़ेगा बीमारियां नहीं आएंगी लोग बीमार कम पड़ेंगे लोग मजबूत होंगे और लोग अपने काम को कर सकेंगे। एक बड़ी सोचनीय विषय यह है कि मानव से विकास करने लगा  है  आप उसको अंदाजा नहीं लगा सकते अंदाजा का अनुमान हम इसे भी कर सकते हैं जो आंकड़े आपके सामने आए हैं आप पिछले 10 वर्षों का आंकड़ा और आज का आंकड़ा से को सामने लेकर बैठे हैं तो हम देख लेते हैं कितनी भी भेजता नजर आती है ऐसे में हमारा कर्तव्य है कुछ ऐसा करें यह सारी समस्याएं दूर हो सके निर्माण करता भी है मां तो है तो करता भी है ऐसे में यह कहा जा सकता है कि हम सब में 1 दिन में सोना चाहिए कि हम एक हम पर्यावरण के प्रति जिम्मेदार बने धन्यवाद

अकबर एक समन्वयवादी शासक

मंगलवार, 12 मई 2020

गाँव को कोरोना से कैसे बचाया जाय।

कोरोना महामारी से ग्रामीण को कैसे बचाया जाय आज एक बड़ी समस्या बनती जा रही है ।जो गाँव इस महामारी से अब तक बचे थे lअब ये महामारी उन गांवों को अपने चपेट में ले रही है। जागरूकता ही बचाव है जो जागरूक नही हैं वो इस दौर में इस महामारी से नही बच सकते है ।

आज कोरोना महामारी के इस दौर में जो भी ग्रामीण बाहर/शहर से गांवो में आ रहे हैं ।गांव में उनको अगर एक जगह 14 दिन तक रखा जाए तो ही कोरोना जैसी खतरनाक महामारी के संक्रमण से उनके परिवार और पूरे गांव को बचाया जा सकता है ।क्योंकि हम सभी जानते हैं कि इस बीमारी का कोई भी इलाज नहीं है ।यह संक्रमण एक दूसरे से दूसरों में फ़ैल रहा है। ऐसे में यह सबकी जिम्मेदारी है कि हम अपने सगे संबंधियों की जिम्मेदारीयो का खुद निर्वहन करें और उनके  और अपने बचाव के आगे बढ़े ।अतः बेहतर यही होगा कि जो भी ऐसे लोग कोई भी हो अगर आपकी ग्राम सभा में आए तो आप उसको कोसी एक जगह ऐसी चुने जहां ऐसे लोगों को 14 दिन रखा जा सके और उनका पूरा ख्याल रखा जा सके। अगर 14 दिन तक  इनको कोई संक्रमण नहीं होता है तो उनके घर जाने दिया जाए ।ऐसा करने से यह फायदा होगा कि आपका गांव  महामारी के चपेट में आने से बच जायेगा और सभी लोग खुशहाल रहेंगे। उम्मीद की जाती है ग्रामीण खुद इस बात को समझेंगे  जानेंगे जागरूकता लाएंगे और इसके लिए खुद ही आगे बढ़ेंगे ।ग्राम प्रधान और गाँव के प्रतिष्ठित लोग विशेषकरके इस कार्य को करने के लिए लोगों को जागरूक करें तो और बेहतर होगा...इस तरह एक छोटे प्रयास से अपने गाँव को खतरनाक सक्रमण से कोरोना से बचाया जा सकता हैं....... धन्यवाद

मंगलवार, 21 अप्रैल 2020

*लॉक डाऊन का प्रभाव* भारतीय गरीब कामगारों पर ....

लॉक डाऊन में गरीब कामगार भुखमरी की कागार पर ही नही है। बल्कि इस महामारी का सबसे ज्यादा मार भी इसी पर पड़ी है।चाहे वो ग्रामीण परिवेश का मजदूर हो या शहरी परिवेश का कामगार हो।सरकार का ध्यान इनकी समस्याओं पर तो हैं उसकी जानकारी में भी है लेकिन योजनाओं का कुछ पता नही सिर्फ कागजी खेल ही है ।धरातल पर सिर्फ हवाबाजी है।.......मेडिकल जाँच और उपचार में सबसे बड़ा उपेक्षित वर्ग अगर कोई है तो ये है।इनके पास अब बचा क्या है।न रोजगार रहा न ही खाने के लिए रसद ऐसे में जीने के इन्हें कुछ भी करना पड़ेगा ।जिसमे इनके अधिकारों या हितों का ध्यान नही दिया जाएगा ।ऐसे में पुनः इन्हें गुलाम बनाने की तरफ़ ले जाया जा रहा है।सरकार ने जो कदम उठाया हैं वो भारत जैसे देश के लिए बहुत ही सोचनीय है।यह वर्ग विभेद को और मजबूती देगी।संगठित क्षेत्र और असंगठित क्षेत्र के कामगारों के बीच जो खाई आजादी के समय से चली आ रही थी ।अब और भी गहरी हो जाएगी।अतः इस दुर्दशा का शिकार जो लोग होंगे। उन लोगों को स्थापित करने का एक बडी चुनौती होगी सरकार के पास.....और सरकार इसके प्रति किसी भी प्रकार से सम्वेदनशील हैं ये दिखाई नही दे रहा है।लगभग 60% कामगारो को इस चुनौती में डूबना तय है।
आप अंदाजा लगा सकते है। सरकार की सोच क्या है।विदेशी
निवेशकों को भारत लाना और विनिवेश को और मजबूती प्रदान करना है जो सरकार की अपनी नीति रही है इस महामारी ने इसको कारण दे दिया है अब।

आज जिस तरह सेंसेक्स में भारी गिरावट आई है उसका प्रभाव भरतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा ये स्वभाविक है।

सोमवार, 28 अक्टूबर 2019

पहलवानी गाँव की

गाँव में अब परम्परागत चीजे लुप्त हो रही हैं उनमे एक  है पहलवानी ।गाँव का अखाड़ा इस बार सुना सुना दिखा जो कभी लोगो के सुबह सुबह इकठ्ठा होने का एक जगह होती थी।कुछ लड़के अपने घर पर ही देशी जिम को बना रखा हैं मैन भी उसका आनन्द लिया पर आखडे के लाइफ को मिस किया ।पुरानी परम्पराओं का खत्म होना अच्छी बात नही हैं.।सायद समय के अनुसार अब उसकी महत्ता न रही पर अगर देखे तो आज कुश्ती प्रतियोगिता की महत्ता है बस स्वरुप बदला है स्टाइल बदली है अब रेसलिंग ने इसी रूप को लिया है ।अगर ये रूप में बदलाव को देख कर वर्क होता तो परम्परा चलती रहती और महत्व दिखता।इसके अतिरिक्त इसका प्रभाव गाँव में लोगो के स्वाथ्य पर भी दिख रहा हैं।युवाओं की शरीर पहले जैसी गठीली नही रही और लोग तरह तरह के विमारियों के चपेट में आने लगे है।इसके अतिरिक्त अखाड़ा लोगो के आपसी सहमति को बनाये रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता था।अब इसके खत्म होने से दूरिया लोगो के बीच बढ़ी हैं।गाँव की संस्कृति खत्म हुई है प्रभावित हुई है।