सोचता हूँ कास!इस उमस भरी गर्मी में गाँव का वो तलाब होता और उसके किनारे पर लगे वो पेड़ होते जिसके किनारे पर पेड़ के नीचे बैठकर पूरा दिन गुजार दिया जाता करते थे । बचपन के दिन हम लोग ऐसे गुजार दिया करते थे ।लेकिन दुःख इस बात का हैं अब तो वो तालाब भी पटने के कागार पर है और वो पेड़ और बगीचे भी कट गए है ,वो कुस की झोपड़ी भी नही रही ,अब तो गाँव भी शहर की तरह पत्थरों /ईटो से बने घरो ने गाँव का पूरा जीवन ही बदल दिया है। गाँव में भी ये उमस भरी गर्मी पीछा नही छोड़ती है अब तो.......गाँव ने खूब विकास किया है.......पर गाँव में अब वो बात नहीं।......खैर क्या करूँ इस उमस भरी गर्मी का ...........एअर कन्डीशन में रहने का आदी नही होना चाहता। फिर करू क्या जिम्मेदार किसको मानु खुद को या इस मानव समाज को या उसके द्वरा किये गये इस विकास को ........हम आगे तो गये है काफी हद तक चाँद तक झण्डा गाड़ा है हमने पर .....उस आनन्द को भी खोया है हमने जो कभी आसानी से मिल जाया करती थी।इस तरह से बहुत कुछ खोया हमने अपने जीवन मे।।।।।।
#डॉ अनिल