भावनाओ से खेल खेलते वो मुकद्दर बनके।
हम ठहरे ही रह जाते और वक्त चला जाता।।
रविवार, 24 मई 2015
वक्त और मैं
वक्त और मैं------कभी वक्त की रफ़्तार से आगे निकल सरे गमो सारे सिकवो को भुला देना चाहता हूँ ,तो कभी सारी हँसी और खुशी खुद में समा लेने को जी चाहता हैं। चाहतो और ख्वाबो की ये दुनिया हर रोज किसी न किसी रूप में सजती है।लगता ऐसा हैं सभ कुछ बस अपनी मुठ्ठी में हैं।पर कब ना जाने ये सारे ख्वाब सारी कल्पना बस धूमिल हो जाती पता नही चलता। बस एक ही चीज जो बस चल रही होती वो बस समय है जो वक्त को भी अपनी तरह से घूमता रहा होता है।बस कुछ ऐसा ही हैं जीवन -----------हैं।जो कल्पना और उनकी उड़ानों में बस उड़ते रहने का ही मन करता ।और इस तरह वक्त और समय की अपनी ये डगर चलती रहती और हम उस भवर में-------------------------------------------------हैं
शनिवार, 23 मई 2015
सवाल जिंदगी के
"सवाल और जबाब"
जिंदगी का एक अहम हिस्सा है।कभी आप भी इस के फेरे में जरूर पड़े होंगे ।जब बात सवालो की आती तो ये लगता मानो जिंदगी सवालो के बोझ तले दब गयी हैं।और जिंदगी को उत्तर देने के लिए उसके पास कुछ भी नही हैं।पर आप इसके फेरे मे कभी चढ़ते है तो कभी उतरते रहते है।ना कभी सवाल खत्म होता न कभी जिंदगी में सकून आता ।बस इसी द्वन्द में अपना~~~~~~~~बस जीवन चलता जाता है।------+++और इस तरह जुड़ता जाता है एक एक दिन---------बस यू कुछ जिंदगी है।सवाल और जबाबो की।
मंगलवार, 19 मई 2015
शेख सलीम चिश्ती की दरगाह
दरगाह शेख सलीम चिश्ती------सुबह के 6 बज रहे थे मैंने आगरा अपने होटल जहा मै रुका था फतेहपुर सिकरी को निकला एक घंटे से भी कम समय में हम सिकरी आ गये |फिर सिकरी की इमारतो और दरगाह और जमा मस्जिद देखा |चुकी फ़तेहपुर सिकरी मेरे शोध का विषय है इस लिए मुझे यहा के इमारतो और यहा की हर एतिहासिक लोकेसन की जानकारी मुझे पहले से थी |फिर भी यहा की इमारतो और धार्मिक इमारतो को देख मनो मेरे मन की वो शुकून मिला बता नही सकता |ये दौरा मै 2008 में किया और यहाँ मै पहली बार गया था | फतेहपुर सीकरी चिश्ती शेख सलीम की ये दरगाह आप के मन को अद्भुत शक्ति और उर्जा प्रदान करती है \ साथ ही मन को शांति और सुकून पहुचती है |लोगो की मुह मागी मुराद भी पूरी होती है |आस्था की अद्भुत मिशाल है |अगर मौका मिले कभी तो आप इस दरगाह में सुकून और शांति के कुछ पल जरुर------- ---------------------------------बिताये
---अनिल कुमार यादव ---
सोमवार, 18 मई 2015
वक्त और मैं---
आज फिर एक बार मैं उन लोगो को समझ नही पा रहा हूँ।जो लोग अपनी बातो और वादे में कभी सच्चाई न ला सके पर हा ये जरूर है कहि ना कहि हम भी उन के लिए जिम्मेदार थे जो अपने ही जेब में आस्तीन का साप लिये घूमते फिरते थे।पर वक्त बदला और वक्त के साथ लोग भी बदल गए पर एक बात ठीक की थी।वक्त ने मुझे और मजबूत बना दिया।

