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रविवार, 24 मई 2015

वक्त और मैं

वक्त और मैं------कभी वक्त की रफ़्तार से आगे निकल सरे गमो सारे सिकवो को भुला देना चाहता हूँ ,तो कभी सारी हँसी और खुशी खुद में समा लेने को जी चाहता हैं। चाहतो और ख्वाबो की ये दुनिया हर रोज किसी न किसी रूप में सजती  है।लगता ऐसा हैं सभ कुछ बस अपनी मुठ्ठी में हैं।पर कब ना जाने ये सारे ख्वाब सारी कल्पना बस धूमिल हो जाती पता नही चलता। बस एक ही चीज जो बस चल रही होती वो बस समय है जो वक्त को भी अपनी तरह से घूमता रहा होता है।बस कुछ ऐसा ही हैं जीवन -----------हैं।जो कल्पना और उनकी उड़ानों में बस उड़ते रहने का ही मन करता ।और इस तरह वक्त और समय की अपनी ये डगर चलती रहती और हम उस भवर में-------------------------------------------------हैं

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